शर्मा जी, वर्मा जी एंड द रिटर्न ऑफ़ कोरोना

सुबह के साढ़े पांच पौने छे बजे थे. सूरज धीरे धीरे निकलने का प्रयत्न कर रहा था. 
वर्मा जी अपने घर के बगान में गरम पानी लेकर कुर्सी पर अभी अभी बैठे थे. गरम पानी मोशन सुधारने के लिए नहीं था. उसमें वर्मा जी ग्रीन टी का एक बैग डुबोने वाले थे. 
twinings ग्रीन टि का बड़ा डब्बा दो दिन पहले छोटी बहु ने अमेज़न से भिजवाया था.
“पापा आपकी तोंद फिर से निकल आयी है,” बड़े प्यार से वो बोली थी. “थोड़ा सुबह उठकर ग्रीन टी पीजिये.” 
इस पर मिसेज वर्मा खिसिया कर बोली: “हाँ, अब तो आप हमारे हाथ की बनी चाय भी नहीं पियेंगे.” पहले तो केवल बेटे को खो देने का गम था. अब पति भी हाथ से निकला जा रहा था. 
इतने में शर्मा जी अपने घर से पूरी तरह तैयार हो कर सुबह की सैर करने के लिए निकले. और जब लोग मुँह पर दो दो मास्क लगा रहे हैं, उन्होंने ने एक भी लगाने की गुंजाईश नहीं की थी. 
“अरे शर्मा जी मास्क तो लगा लीजिये,” वर्मा जी ने पुकारा. 
“भाई हम दो दिन पहले ही गंगा जी में डुबकी लगाए हैं,” शर्मा जी ने जवाब दिया. 
“अच्छा तब तो ठीक है.”
“हाँ.”
“वैसे भी मिश्रा जी अभी दो दिन पहले…”
“कौन वाला मिश्रा, पान वाला या गुटका वाला?” शर्मा जी ने पुछा. 
“पान वाला.”
“हाँ फिर ठीक है.” 
“क्यों?” वर्मा जी ने पुछा. 
“अरेु ऊ गुटका वाला बहुत थूकता है हर जगह.” 
“अब का करेगा, गुटका का पीक मुंह में थोड़े रखा रहेगा.” 
“छोड़िये. आप क्या कह रहे थे?” शर्मा जी ने पुछा.  
“हाँ तो मिश्रा जी एक ठो फॉरवर्ड भेजे थे व्हाट्सप्प पर.”
“अच्छा.”
“उसमें ऐसा लिखा था कि, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च हुआ है…”  
“अब ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च नहीं होगा तो का रांची यूनिवर्सिटी में होगा?” शर्मा जी ने टोका और फिर अपने ही चुटकुले पर ज़ोर ज़ोर से हसने लगा. “आप भी न वर्मा जी.” 
“अरे आप बोलने तो दीजिये.” 
“अच्छा, बोलिये बोलिये.” 
“तो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में एक ठो रिसर्च हुआ है. उसमें ये पाया गया कि गंगा जी में डुबकी लगाने से बॉडी में ऐसा ऐसा मिनरल आ जाता है, जिससे कोरोना पास भी नहीं आता है, दुरे से निकल लेता है.”
“हम तो बोल ही रहे थे,” शर्मा जी ने कहा. 
“हाँ, पर फिर भी लगा लीजिये, नहीं तो ठोलवा सब पकड़ लेगा.”
“इतना सुबह सुबह?” 
“हे हे.” 
“ऐसे मिशरवा हमको भी एक फॉरवर्ड भेजा था,” शर्मा जी ने कहा. 
“पान वाला या गुटका वाला?” 
“गुटका वाला।” 
“गुटका वाला?”
“हाँ थूकता बहुत हैं, पर फॉरवर्ड अच्छा भेजता हैं.”
“हमको तो नहीं भेजता है.” 
“अरे, आप टेलीग्राम पर हैये नहीं है की.”
“टेलीग्राम? ऊ तो कितने साल से बंद हो गया नहीं?” वर्मा जी ने एकदम आश्चर्यचकित हो कर कहा. 
“अरे, वो वाला नहीं.”
“तो फिर कौन वाला.”
“अभी अभी व्हाट्सप्प जैसा आया है.” 
“व्हाट्सप्प जैसा टेलीग्राम?” वर्मा जी के पल्ले नहीं पड़ रहा था कि शर्मा जी क्या बोल रहे थे. 
“आपके यहाँ कपडा कौन वाशिंग पाउडर में धुलता है?”
“मिसेज़ को तो सर्फ एक्सेल पसंद है. पर बहुत महंगा पड़ता है, इसलिए थोड़ा रिन के साथ मिला देते हैं.”
“हमारी मिसेज़ को अरियल पसंद है.”
“अच्छा.”
“अब जैसे अलग अलग वाशिंग पाउडर आता है…”
“अच्छा अब समझ में आया. टेलीग्राम नया टाइप का व्हाट्सअप है,” वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा. 
“हाँ.”
“तो आप क्या कह रहे थे?” वर्मा जी ने पुछा. 
“तो गुटका वाला मिशरवा एक ठो फॉवर्ड भेजा,”  शर्मा जी बोले. 
“अच्छा.”
“उसमें ये बताया था कि कोरोना जैसा कुछ नहीं है. पूरा का पूरा एक साज़िश है,” शर्मा जी ने कहा. 
“साज़िश? किसका?” 
“सीआईए और बिल गेट्स का.”
“एह. हम तो सुने कि चाइनीज़ लोग चमगादड़-वमगादड़ खाकर इसको फैलाया है.”
“अरे ऊ तो पुराना न्यूज़ है. अभी सुनिए.”
“अच्छा.”
“सीआईए और बिल गेट्स, मिलकर अफवाह फैलाया है कोरोना के बारे में.”
“पर वो लोग ऐसा क्यों करेगा?”
“देखिये सीआईए का तो मालूम नहीं, पर बिल गेट्स का हम समझ सकते हैं.”
“समझ सकते हैं?” वर्मा जी ने पुछा. “कैसे?” 
“अरे, अब इतना पैसा कमा लिया. माइक्रोसॉफ्ट को इतना बड़ा कंपनी बना दिया. तीन ठो बच्चा लोग भी बड़ा हो गया है उसका. घर छोड़ कर जाने के लिए तैयार है.”
“हाँ तो?” वर्मा जी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था. 
“हम लोग के यहाँ तो बच्चा लोग जब घर भी छोड़ता है, तो माँ बाप के बारे में सोचता है. दादा दादी, नाना नानी बनाता है. इसलिए हम लोग का मन लगा रहता है और समय बीतता जाता है.”
“एकदम सही बोले आप शर्मा जी,” वर्मा जी ने कहा. कल रात को ही खबर आयी थी कि उनके सबसे छोटे बेटे चिंटू और उसकी बीवी रिंटू को, इशू होने वाला है. 
“पर अमरीका में इंडिया जैसा वैल्यूज नहीं न है. तो बिल गेट्सवा अब बोर हो गया है. इसलिए सीआईए के साथ मिलकर अफवाह फैला दिया कोरोना के बारे में.” 
“अरे बाप रे.”
“एकदम. मिश्रा जी का फॉरवर्ड कभी गलत नहीं होता है. कोरोना जैसे कुछ नहीं है. और जो है ही नहीं वो किसी को कैसे हो सकता है.”
तभी शर्मा जी के घर के अंदर से आवाज़ आयी. 
“अच्छा सुनते हैं,” मिसेज़ शर्मा बोली. “आधा दर्जन अंडा और एक डबल रोटी भी ले आइयेगा.”
“हाँ ठीक है,” शर्मा जी ने जवाब दिया. 
“अंडा?” वर्मा जी ने पुछा. “आप लोग अभी भी अंडा खाते हैं?” 
“काहे?”
“अरे आप को कोई मेनका गाँधी का अंडे वाला फॉरवर्ड नहीं भेजा क्या आज तक व्हाट्सप्प पर.” 

मिसेज़ शर्मा, मिसेज़ वर्मा एंड द रिटर्न ऑफ़ कोरोना 

शाम के छे-साढ़े छे बजे हैं. सूरज ढल चुका है. कोरोना की दूसरी वेव का प्रकोप शहर में फैल चुका है. ऐसे माहौल में, मिसेज़ शर्मा और मिसेज़ वर्मा अपने अपने घर के सामने छोटे से बगान में बैठी हुईं, सोशल डिस्टन्सिंग बनाये हुए, एक दुसरे से बातें कर रही हैं. 
आईये सुनते हैं. 
“और आप सूई ले लीं? मिसेज़ शर्मा ने पुछा. 
“अब क्या बताएं,” मिसज़ वर्मा ने जवाब दिया. “अरे परसों मिस्टर और हम गए थे. अस्पताल पहुंचे तो Compounder मिस्टर से बोलिस, आज तो ख़तम हो गया है सर.” 
“ख़तम, ख़तम कैसे हो गया?”
“हम भी वही बोले.” 
“तब तो टीका उत्सव चल रहा था न.”
“हम भी वही बोले.” 
“मोदी जी दिन में 18 घंटे काम कर रहे हैं और ई सब compounder लोग से दू ठो सुई नहीं संभल रहा है.”
“हम भी वही बोले,” मिसेज़ वर्मा ये बोलकर जैसे अटक सी गयी. 
“और आपका चुन्नू ठीक है?” मिसेज़ शर्मा ने पुछा. 
“हाँ ठीक ही है,” मिसेज़ वर्मा का जवाब आया. 
“और इशू–विशु के बारे में कुछ सोचा कि नहीं?”
“अरे क्या बताएं,” मिसेज़ वर्मा बोलीं. 
“ऐसे अभी तो टाइम भी सही था,”  मिसेज़ शर्मा बोली. 
“मतलब?”
“सबका वर्क फ्रॉम होम चल रहा है.”
“हाँ तो?”
“अरे आदमी घर से काम करता है तो थकता कम हैना. ज़्यादा ताकत रहता है ” 
“अच्छा समझे.”
“ऐसे तुमको एक बात बोलेंगे, बुरा मत मानना.” 
“अरे नहीं बोलिये, बुरा काहे मानेंगे, ” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
“हमारी मंझली दीदी का लड़का हैना.”
“कौन बबलू?” 
“हाँ. तो वो भी बहुत दिन तक इशू नहीं किया.” 
“अच्छा फिर?”
“फिर क्या, दवाई का आदत लग गया. बहुत मुश्किल से हुआ.” 
“अरे बाप रे.” 
“इस लिए समय रहते कर लेना चाहिए,” मिसेज़ शर्मा ने कहा. “हर चीज़ का एक उम्र होता है.” 
“ऐसे हम परसों ही पूछे उससे कि क्या प्लान है,” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
“क्या बोला?”
“बोला, मम्मी ऐसी दुनिया में बच्चा लाकर क्या मतलब.”
“मतलब?”
“हम समझाये, के बेटा, बच्चा कोई मतलब के लिए थोड़े पैदा करता है. बच्चा पैदा करना होता है, इसलिए पैदा करता है.”
“अच्छा. फिर क्या बोला?” मिसेज़ शर्मा ने पूछा. 
“बोला, मम्मी तुम समझ रही हो क्या बोल रही हो.”
“ओह, ऐसा बोल दिया.” 
“हाँ.”
“हम तो तुमको बोले थे, जेनयू वेनयू मत भेजो. बच्चा लोग घर से बहार डॉक्टर इंजीनियर बनने के लिए निकले तो अच्छा लगता है. हिस्ट्री पढ़ने के लिए इतना मेहनत…” 
“हाँ आप तो बोली थी. और हम भी मिस्टर को बोले थे. पर वो उधर से बोले, कब तक अपने पास बांध के रखोगी,” मिसेज़ वर्मा ने कहा.
“ऐ माँ, गाय है क्या जो बांध कर रखेंगे.”
“सही कहीं आप.” 
“हमारी बड़ी दीदी का लड़का…”
“चिंटू?” 
“हाँ. वो भी जेनयू गया था, करीब दस साल पहले.” 
“अच्छा.” 
“बस बंगाली लड़की से शादी कर लिया.” 
“अरे बाप रे. बहुत एग्रेसिव होगी वो तो?”
“हैये है कि. कच्चा चबा गयी अपनी सास को,” मिसेज़ शर्मा ने कहा.
“दीदी और जीजाजी आपके मान कैसे गए?” मिसेज़ वर्मा ने पूछा.
“शुरू में नहीं माने थे. फिर चिंटू बोला, शादी कर रहे हैं, आना है तो आईये, नहीं तो भाड़ में जाईये.”
“बच्चा लोग के सामने आदमी मजबूर हो जाता है.”
“एकदम. हम तभी राजू को जेनयू नहीं भेजे. बोले यहीं रांची यूनिवर्सिटी में पढ़ लो.” 
“एकदम ठीक की.” 
“तभी मोदी जी कहते हैं, हार्डवर्क इस मोर इम्पोर्टेन्ट दैन हारवर्ड,” मिसेज़ शर्मा ने कहा. 
“कहेंगे नहीं. वो तो पूरा पोलिटिकल साइंस पढ़े हैं,” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
तभी मिसेज़ वर्मा के घर के अंदर से आवाज़ आयी. “शीला, गप मारना ख़तम करो. भूक लगी है. डिनर दे दो.” 
“मिस्टर बुला रहे हैं लगता है?” मिसेज़ शर्मा ने कहा. 
“हाँ.”
“पर पौने सात बजे डिनर?”
“अब क्या बताएं.” 
“क्या हुआ?”
“अरे छोटी बहु बोल दी है कि पापा आपका तोंद निकल गया है. अच्छा नहीं लग रहा है.” 
“ओह चुन्नू की मिसेज़ ऐसा बोल दी.” 
“हाँ.”  
“तो?”
“इसलिए, आजकल जल्दी खा रहे हैं…उसको का बोलते हैं.” 
“इंटरमिटेंट फास्टिंग.” 
“हाँ वही करने की कोशिश कर रहे हैं.”
“अच्छा.”
“इनको न हमेशा से मन था कि एक बेटी भी हो,” मिसेज़ वर्मा ने थोड़ा शर्मा के कहा. “इस लिए छोटी बहु का बात इतना ध्यान से सुनते हैं.” 
“अच्छा.”
“तीन लड़का के बाद, बोले एक बार और ट्राई करते हैं, हो सकता है इस बार बेटी हो जाए.” 
“अच्छा.” 
“पर हम हाथ खड़ा कर दिए.”
“अच्छा.” 
“बोले, और ताकत नहीं है.” 
“अच्छा.” 
“पहले ही तीन बच्चा संभालना…” 
“शीला,” मिसेज वर्मा के घर के अंदर से फिर आवाज़ आयी. 
“अच्छा तो हम चलते हैं,” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
“फिर कब मिलयेगा?” मिसेज़ शर्मा ने पुछा. 
“जब आप कहियेगा.” 
“जुम्मे रात को?”
“नहीं आधी रात को.”
 

राजा बाबू से मंडेला — निर्मल आनंद से इंटेलेक्चुअल सटिस्फैक्शन तक का सफर  

कल शाम को चैनल बदलते बदलते, या फिर ये कहिये कि OTT बदलते बदलते, नज़र एक तमिल फिल्म पर आकर टिकी. नाम था, मंडेला
खाना खाते खाते फिल्म का पहला आधा घंटा देखा. मज़ा आया. फिल्म एक ब्लैक कॉमेडी है और ब्लैक कॉमेडी और हमारा तो पुराना याराना है. खैर, फिर कुछ काम आ गया इसलिए पूरी फिल्म नहीं देख पाया. एक-आद दिन में निपटा दूंगा. 
रात को तकिये पर सर रखने से लेकर नींद आने तक, मेरे दिमाग में एक ख्याल आया. आजकल हमारे लिए एक हिंदी फिल्म देखना बहुत ही मुश्किल हो गया है. 
एक ज़माना था जब हम सिनेमा निर्मल आनंद के लिए देखते थे. अब हम फिल्म निर्मल आनंद के साथ साथ, इंटेलेक्चुअल सटिस्फैक्शन के लिए भी देखते हैं. और जब तक इंटेलेक्चुअल सटिस्फैक्शन नहीं होता तब तक निर्मल आनंद भी नहीं आता है. 
अब जनवरी 21, 1994, की बात ले लीजिए. राँची के सुजाता सिनेमा में डेविड धवन कृत राजा बाबू लगी थी. हम लोग फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने पहुंचे. लाइन में लगे और थोड़ी धक्कम धुक्की होने के बाद हम लोगों को ड्रेस सर्किल की टिकेटें मिल गयी. ये वो दिन थे जब फिल्म देखने से ज़्यादा मज़ा फिल्म की टिकट मिलने में आता था. 
फिल्म शुरू हुई. वो गोविंदा का ज़माना था. और अगर साथ में अगर करिश्मा कपूर, कादर खान, शक्ति कपूर, समीर, आनंद मिलिंद और डेविड धवन, भी हों, फिर तो सुभान अल्लाह. गोविंदा के अलावा ये सभी लोग राजा बाबू से जुड़े थे. पर फिल्म में वो मज़ा नहीं था जितना कि गोविंदा की फिल्मों में अमूमन हुआ करता था. 
दो घंटे से ऊपर गुज़र चुके थे और पूरे हॉल में एक सनाटा सा छाया हुआ था. लग ही नहीं रहा था कि गोविंदा की फिल्म चल रही है. उसी साल आयी द्रोहकाल, जो कि एक ज़बरदस्त आर्ट मूवी थी, के शोज में, उस दिन से ज़्यादा हल्ला हुआ था. (जी हाँ हम उस समय भी आर्ट फ़िल्में देखा करते थे वो भी सिनेमा हाल में जाकर). 
फिल्म ख़त्म होने से कुछ समय पहले, परदे पर आया उस साल का एकदम सुपरहिट गाना. सरकाये ल्यो खटिया जाड़ा लगे. और पब्लिक ने तब तक गोविंदा और डेविड धवन से हुआ सब गिला शिकवा माफ़ कर दिया. कुमार साणु और पूर्णिमा के इस गाने ने एकदम बवाल मचा दिया. अगर अंग्रेजी में कहें तो द ऑडियंस वास् डांसिंग इन द aisles. 
वो ज़माना था डबल मीनिंग गानों का और सरकाये ल्यो खटिया जाड़ा लगे, मेरे हिसाब से, इन डबल मीनिंग गानों की लिस्ट में नंबर दो की पायदान पर आता है. आप पूछेंगे कि नंबर वन गाना कौन सा था. अब ये भी कोई बताने वाले बात है. हिंदुस्तान में रहकर, हिंदी सिनेमा देखने के बाद अगर इतना भी नहीं पता… तो आप एंटी नेशनल, टुकड़े टुकड़े गैंग में शामिल हो चुके लुट्येन्स दिल्ली के आखरी लिबरल हैं. 
ख़ैर, आप भी ये सोच रहेंगे के मैं भी कहाँ मंडेला से शुरू करके राजा बाबू तक पहुँच गया. शायद ये समझाने की कोशिश कर रहा था कि उस ज़माने में फिल्मों से सीधी सीधी अपेक्षा होती थी. 
फिल्म का हीरो थोड़ा रोमांस करेगा, गाना गायेगा, नाचेगा, विलेन की पिटाई करेगा और अगर इन सबके ऊपर अगर कॉमेडी भी करे, फिर तो पूरा पैसा वसूल.
रही हीरोइन की बात तो वो भी रोमांस करेगी, गायेगी, नाचेगी और थोड़ा रोयेगी. 
अगर फिल्म में विलेन है तो वो हीरो-हीरोइन के बीच में अपनी टाँगे अड़ाएगा. जैसा की मोहनीश बहल मैंने प्यार किया में कहते हैं, एक जवान लड़का और एक जवान लड़की कभी अच्छे दोस्त नहीं हो सकते. पहले कुछ इस किस्म उलटी-पुलटि बात करेगा और अंत में हीरोइन के साथ थोड़ी बहुत बदतमीज़ी भी, जिसके बाद हीरो आकर उसकी पिटाई करेगा. 
हीरो की माँ रोएगी और अपने बच्चे के लिए अच्छी नौकरी और अच्छी बीवी की दुआ करेगी. 
और फिर, एवरीवन विल लिव हैप्पिली एवर आफ्टर. 
अगर किसी भी फिल्म में इन सब चीज़ों का ठीक ठाक सा मिश्रण मिल जाता था, तो लोग उस फिल्म को दो एक बार देखकर चला ही देते थे. और हम भी ऐसी पब्लिक का हिस्सा थे काफी सालों तक. कम से कम 1993 से 1999 तक, जब हम रांची के सिनेमा घरों में अक्सर सिनेमा फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखा करते थे. (करीब दस साल हो गए कोई भी फिल्म फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखे हुए. अब जब आराम से ऐसा किया जा सकता है, तो मन नहीं करता है.) 


1999 के बाद चीज़ें बदली. थोड़ा पढ़ लिख ज़्यादा गये. थोड़ा अंग्रेजी सिनेमा देख लिया. और 2006 से 2009 के बीच में बहुत सारा इंटरनेशनल सिनेमा भी.
अंग्रेजी फ़िल्में देखने के बाद ये पता चला की उनकी फ़िल्में हमारे फिल्मों से कितनी बेहतर बनती हैं, या फिर हम लोग सीन बी सीन कॉपी करते हैं. अब शायद पॉसिबल नहीं है पर एक ज़माने में तो होता ही था. यकीन नहीं आता तो कभी 1934 की हॉलीवुड फिल्म, इट हप्पेनेड वन नाईट देखे और इसके बाद महेश भट की 1992 की फिल्म दिल है के मानता नहीं. सीन बाय सीन कॉपी है.  
यहाँ तक कि इट हप्पेनेड वन नाईट के डायलॉग्स को सीधे सीधे हिंदी में ट्रांसलेट किया गया है. और आश्चर्य की बात तो ये है कि डायलाग लिखे थे मशहूर लेखक शरद जोशी जी ने. 
जब इंटरनॅशनल सिनेमा देखा तो ये समझ आया की सीरियस मुद्दों पर भी फ़िल्में बनायीं जा सकती थी. और रोमांस, नाच, गाना, मार धाड़ के अलावा, फिल्मों में नुआन्स (nuance) भी हो सकता है. और निर्मल आनंद के अलावा फ़िल्में इंटेलेक्चुअल सेटिफेक्शन भी दे सकती हैं. 
और धीरे धीरे इंटेलेक्चुअल सटिस्फैक्शन हावी होता गया. केवल ये काफी नहीं था कि स्क्रीन पर क्या चल रहा है. ये भी जानना ज़रूरी था की फिल्म के डायरेक्टर और लेखक की पॉलिटिक्स क्या है. उन्हें इंस्पिरेशन कहाँ से मिला है. फिल्म के डायलॉग्स में दम है की नहीं. वगैरह वगैरह. एक फिल्म देखने में और एक किताब पढ़ने में ज़्यादा अंतर नहीं रह गया. 
और इसका नतीजा ये हुआ की धीरे धीरे हिंदी फ़िल्में देखना एकदम बंद सा हो गया है, क्यूंकि किसी भी फिल्म से जो उमीदें थी, वो बहुत ज़्यादा बढ़ गयी. और जैसे जैसे हमारा टेस्ट बदला वैसे वैसे गोविंदा का करियर भी ख़तम होता चला गया. क्यूंकि गीता का सार है, परिवर्तन ही इस दुनिया का नियम है. 
अब खोज रहती है अच्छी फिल्मों की. भाषा चाहे कोई भी हो, क्यूंकि मर्द को दर्द नहीं होता और इंटेलेक्चुअल सटिस्फैक्शन ज़रूरी है. 

बिना सनी देओल के कैसे बनी Dunkirk?

sunny deol

ऊ बोलिस के एक ठो अंगेरजी में Dunkirk करके सिनेमा आया है. देखेंगे का?

अरे एक बार बॉर्डर देख लिए उसके बाद भी कोई यो वॉर मूवी बचा है का देखने के लिए?

अरे बहुते अच्छा स्पेसल इफ़ेक्ट दिया है, हम सुने हैं.

अरे दिया होगा! पर एक्को ठो गाना नहीं है फिल्म में.

पर सुने के बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुते बोवाल है.

अरे रहने दो. इ भी कोई सिनेमा हुआ, के हेरोइनवा एक्को बार रोइ नहीं, गणवा भी नहीं गाई. कुछ नहीं तो संदेसे आते हैं वाला गणवा ही डाल दिया होता.

हैं?

और नहीं तो का.  जे पी दत्त्वा से केवल राइट्स तो लेना था…और सोनुवा तो ऐसे भी बेकार है आजकल, फ्री ये में गा दिया होता.

हैं?

और बताईये, सनी देओल के ढाई किलो के हाथ के बगैर कोई वॉर मूवी बन सकता है का…

Where George Orwell meets Wasim Barelvi 

george orwell
अभी कुछ दिनों की बात के एक मित्र जो के हिंदुस्तानी में थोड़ा बहुत लिखते हैं, उन्होने पुछा के जॉर्ज ओरवेल की Animal Farm में एक पंक्ति है “All animals are equal, but some animals are more equal than others,”  इसका हिंदुस्तानी में क्या अनुवाद होगा.

अब एक तरीका ये था के ओरवेल की इस पंक्ति का सीधे सीधे अनुवाद किया जाए. मुझे ये तरीका बड़ा बोरिंग लगा, क्यूंकि हर भाषा में इतनी गहराई होती है, के कम से कम मिसाल तो उसी भाषा में दी जा सके.
तभी मेरी tubelight हमेशा की तरह देर से जली और प्रोफेसर वसीम बरेलवी का एक शेर याद  आया: “गरीब लहरों पर पहरे बिठाये जाते हैं, समन्दरों की तलाशी कोई नहीं लेता”. इस शेर का भी लगभग वही माने है जो ओरवेल की पंक्ति का है.

ओरवेल ने अपनी बात प्रोफेस्सर बरेलवी से काफी पहले कही थी. क्या ओरवेल की ये पंक्ति प्रोफेसर साब के शेर की प्रेरना है? अब ये तो वही बता सकते हैं.

मतलब इसका ये है, के दुनिया में जो भी कहा जा सकता है, वो कहा जा चूका है. आप बस इतना कर सकते हैं को उसी बात को अपने अंदाज़ में कह सकते हैं. और अपने अंदाज़ में प्रोफेसर बरेलवी ने ये बात खूब कही है.

अब GST को ही ले लीजिये…
Prof._Wasim_Barelvi_(2)