Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi — The Last Tune I Still Hear

Tulsi and Mihir are back.

Come July 29th, Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi (KSBKBT) returns to our screens. And for reasons I can’t entirely explain, I’m oddly thrilled about it. So much so, a friend quipped, “You must have been a die-hard fan once.”

Honestly, I wasn’t. At least, I don’t think I was. I don’t remember watching even a single episode of the 1,833 that aired. Or maybe I did catch a few, and don’t remember anymore. Memory is a slippery thing, and as Julian Barnes writes in Changing My Mind: “A single person’s memory, uncorroborated and unsubstantiated by other evidence, is a feeble guide to the past.” Still, this isn’t a murder trial or a political memoir. I’ll go with what I remember – or think I do.

If I were the kind who turned everything into a life lesson on LinkedIn, I’d probably use the return of KSBKBT to say something profound: that life gives second chances. Look at Amar Upadhyay. He left the show at his peak to chase cinema. The movies didn’t love him back, but now he’s back to what made millions of homemakers fall in love with him.

Or I’d say, always have a Plan B. Look at Smriti Irani – who moved from Tulsi to Parliament, from sanskaar to Sansad, and now returns to what perhaps she does best.

Or, if I was in the business of managing other people’s money (OPM), I’d say: diversify your career like your investments. Don’t put all your dreams in one TRP basket.

But thankfully, I don’t write motivational posts on LinkedIn.

What I do remember, even without watching the show, is the song. The title track. And for those who’ve never heard it, here’s how it went:

Rishton ke bhi roop badalte hain,
naye naye saanche main dhalte hain,
ik peedhi aati hai, ik peedhi jaati hai,
banti kahani nayi,
kyunki saas bhi kabhi bahu thi.

It was perhaps the last thing that ever truly entered my ears – and stayed. It reminds me of a slower world, when sounds weren’t just background noise, but memories waiting to be etched.

I remember a voice announcing: “Yeh Akashvani hai; ab aap Devaki Nandan Pandey se Samachar suniye.”

I remember another voice – Ameen Sayani, the only hero I’ve ever had – beginning the Binaca Geetmala with, “Behno aur Bhaiyyon” (and never Bhaiyyon aur Behno).

I remember the Doordarshan signature tune, composed by Pandit Ravi Shankar and Ustad Ali Ahmed Hussain Khan, playing before the broadcast started.

I remember All India Radio’s signature tune that would even sneak in before sunrise.

I remember Sholay’s dialogues blaring from paan shops, Gabbar Singh’s gravelly voice cutting through traffic with “Arre O Sambha…”

I remember Chitrahaar, broadcast from Delhi on Wednesdays and Fridays at 8 pm, regularly playing Nanha Munna Rahi Hoon / Desh ka Sipahi Hoon. A song from a forgotten 1962 release, Son of India, but one a generation grew up with.

One line from that song still echoes in my mind:
Naya hai zamana, nayi hai dagar / Desh ko banaoonga machino ka nagar. Roughly: “This is a new world, we’ll build a land of machines and factories.” Sixty-three years later, in 2025, we’re still waiting.

I remember, the music director, Vedpal’s most famous composition: “Nirma, Nirma, Washing Powder Nirma.”

I remember Bajaj bulbs, “Ab main bilkul budha hoon, goli khaakar jeeta hoon.”

I remember Javed Jaffrey – one of India’s greatest dancers who the country hasn’t seen enough of – featuring in an advertisement of Hamdard’s Cinkara: “Yeh bechara kaam ke bojh ka maara, inhe chahiye Hamdard ka tonic Cinkara.”

I remember Sushil Doshi trying to make cricket commentary sound literary: “Dudhiya roshni mein nahaya hua Mohali ka ye stadium.”

I remember Sudesh Bhosale singing Jumma Chumma De De in Bachchan’s voice – despite Vividh Bharti banning the song, because we Indians apparently don’t kiss, we only tell.

I remember Choli ke peeche kya hai. I remember Guttar guttar.

I remember Amrish Puri in DDLJ telling Kajol: “Ja Simran, ja jee le apni zindagi.”

I remember Altaf Raja’s anthem – tum to thehre pardesi, saath kya nibhaoge – that had both young men and truck drivers, equally heartbroken. 

I remember Shah Rukh Khan in Dil To Pagal Hai: “Rahul… naam to suna hoga?”

And through it all, I remember the Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi song.

And then things changed: Life happened.

I had to go out and make a living in a world I hadn’t entered of my own volition: a world I still haven’t made sense of. Like Bill Watterson’s Calvin once said, “How old do you have to be before you know what’s going on?”

I don’t know the answer. But now, a little closer to fifty, I know this: very few things survive time. Even fewer people do.

But the KSBKBT song has. It has endured.

Though its creators haven’t.

Hardly anyone remembers Priya Bhattacharya, who sang it. Or Nawab Arzoo, who wrote the lyrics. Or Lalit Sen, who composed it.

I wonder what became of them. I really do.

शिक्षित बेरोज़गारी के दस साल 

आज शिक्षित बेरोज़गारी के दस साल पूरे हो रहे हैं. 1 अप्रैल 2012 से शुरू किया था. शुरू क्या किया था, बस हो गया था.
आराम से बैठकर तनख्वाह उठाने में शर्म सी आने लगी थी और किताब को किसी भी तरह से पूरा करके छपवाने का जुनून सिर पर सवार था.
ये तो कभी नहीं सोचा था कि शिक्षित बेरोज़गारी में यूँही दस साल गुज़र जाएंगे. हल्का फुल्का प्लान ये था कि किताब लिखेंगे, छपवाने की कोशिश करेंगे और फिर उसके बाद देखा जाएगा.
अब ज़िन्दगी कोई कंप्यूटर प्रोग्राम तो है नहीं कि जब तक सारी कोडिंग ठीक से न की गयी हो, तो चलेगी नहीं. इसलिए चल गयी.
किताब तो छप गई. एक नहीं तीन. अंग्रेज़ी वालों ने ट्राइलॉजी बना दिया. और धीरे धीरे काम भी आने लगा. पहले थोड़ा थोड़ा और फिर अचानक से बहुत सारा.
जब किताब छप गयी, फिर अलग अलग अख़बारों और websites पर छपने के जूनून ने तूल पकड़ा. एक समय ये भी था जब हफ़्ते में दस बारह कॉलम तो छप ही जाते थे.
दैनिक जागरण से लेकर डेक्कन क्रॉनिकल तक और बैंगलोर मिरर से लेकर बीबीसी तक, सब जगह मेरे लेख छपे. हिंदी में अर्थशास्त्र पर लिखने की आदत भी बनायी. (जी. GST को माल और सेवा कर कहते हैं और फिस्कल डेफिसिट को राजकोषीय घाटा).
इसके अलावा काफी नामचीन प्रबंधन विद्यालयों (business schools) में लेक्चर देने का मौका भी मिला. अहमदाबाद से बेंगलुरु तक, मुंबई से मणिपाल तक और रोहतक से लेकर रांची तक.
आजकल थोड़ा स्लो चल रहा हूँ. सलीम ख़ान को कहीं ये कहते सुन लिया था कि पैसे ना कहने के मिलते हैं. तो अपनी ज़िन्दगी में ये प्रयोग कर रहा हूँ. आशा करता हूँ आने वाले सालों में ख़ान साहब की कही बात थोड़ी बहुत तो सही निकलेगी.
इस सफर में दिल्ली के बाहर के संपादकों ने बहुत साथ दिया, खासकर मुंबई और बेंगलुरु के संपादकों ने. यहाँ ये भी कहना ठीक रहेगा कि दसवे साल में दिल्ली का दरवाज़ा भी धीरे धीरे खुलने लगा है, अब देखना ये है कि ये दरवाज़ा कितना खुलता है और कब तक खुला रहता है.
आजकल मन में ये सवाल बहुत आता है कि शिक्षित बेरोज़गारी का निर्णय सही था या फिर नौकरी करते रहना चाहिए था?
लगभग हर दिन लिख कर दुनिया को ये चिल्ला चिल्ला के बताना के भाई पढ़ो, हमने लिखा है, इस का अंत में क्या हश्र होगा?
हमारे लिखने से कभी कुछ बदलता भी है क्या?  क्या कीबोर्ड तलवार से वाकई ज़्यादा शक्तिशाली है? या फिर paywall ने बीच में आकर गेम बजा डाली है?
या फिर सोशल मीडिया के ज़माने में, where you can flood WhatsApp with shit, दो एक लोगों के लिखने या न लिखने से क्या ही फरक पड़ता है?
या फिर क्या कोई भी काम करने के लिए किसी गहरी वज़ह का होना ज़रूरी होता है क्या? या फिर कुछ लोग साबुन बेचते हैं, और कुछ लोग शब्द? और ग़लतफहमी तो सबको होती है. मुझे भी है. नहीं तो मैं अभी भी किसी आईटी कंपनी का मुलाज़िम होता.
ऐसे सवालों के कोई आसान जवाब तो होते नहीं और ज़िन्दगी  में केवल सोच प्रतितथ्यात्मक (counterfactual) हो सकती है.

अब इस बात पर एक शेर याद आ गया. जैसा चचा ग़ालिब कह गए हैं:

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता .

और अंत मे नास्तिक होते हुए भी ये प्रार्थना करता हूँ कि पाठकों, सम्पादकों और सबसे ज़्यादा प्रबंधकों और मुनीमों की मुझ पर कृपा बनी रहे. कहिये तो Chivas Regal चढ़ा आता हूँ.
हाँ और शिक्षित बेरोज़गारी की दो चीज़ें हमेशा मुझे प्रेरित करती रही रहेंगी, एक तो इसकी आज़ादी और दूसरी केवल अपने प्रति और अपने पाठकों के प्रति जवाबदेह होना.
अब हर दिन तीन से चार बजे तक सोना का मज़ा तो वो ही जानते हैं जो हर दोपहर को सोते हैं. आप भी कभी करके देखिए, मज़ा आएगा. और जब आप सो कर उठेंगे मुझसे मिलिएगा ज़रूर, बुत बनकर बैठेंगे.
मैं शब्द बेचता हूँ. आप ज़रूर खरीदते रहिएगा क्यूंकि अब बेरोज़गारी हमारे खून के ज़र्रे ज़र्रे में बस चुकी है.

कोरोना काल में छोटू बाबू की बड़ी शादी

शाम के पौने सात बजे थे. बिजली कटी हुई थी. पूरी गली में अँधेरा छाया हुआ था. 
पर प्रोफेसर पी के श्रीवास्तव का घर दूधिया रोशनी में समझो नहा सा रहा था. उनके बड़े बेटे छोटू की शादी थी. 
अमूमन तो छोटे बेटे का नाम छोटू रखा जाता है. पर यहां हुआ ऐसा था कि जब छोटू पैदा हुआ तो वो इतना छोटा था कि लोगों ने उसका नाम छोटू रख दिया. भाई मोहल्ले का भी कुछ हक़ तो बनता ही था प्रोफेसर साहब पर. 
खैर फ़िलहाल छोटू को रहने दीजिये, काम की बात करते हैं. 
पूरी गली में अँधेरा था तो प्रोफेसर सब घर टिमटिमा कैसे रहा था? उसके लिए आपको प्रोफेसर साहब के छोटे साले लल्लन को धन्यवाद देना पड़ेगा. लल्लन जी ने पीछे के फेज से बिजली खींच ली थी. अगर बिजली खींचने में कोई यूनिवर्सिटी पीएचडी वगैरह देती है तो लल्लन को तो ज़रूर मिलना चाहिए. 
“बहुत बढ़िया बिजली खींचे हो लल्लन,” प्रोफेसर साहब ने लल्लन से कहा. 
लल्लन ने इसका जवाब अजीब तरह से मुस्कुरा के दिया. ये वैसी ही मुस्कराहट थी जो मिडिल एज्ड भारतीय आदमियों में अक्सर पायी जाती है, जब वो कुछ कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते हैं. 
“क्या हुआ?” प्रोफेसर साहब ने पुछा. वो समझ गए कि लल्लन कुछ कहना चाह रहा है. 
“जीजाजी वो व्यवस्था हो गयी है ना?” लल्लन ने एकदम लजा लजा के पुछा, जैसे की किसी की शादी में पहली बार दारु पीने वाले हों. 
“हाँ, आखरी वाली कार में सब रखवा दिया है. ओल्ड मोंक, वैट 69, सब कुछ.” 
“और चखना वगैरह?”
“उसका भी बंदोबस्त हो गया है. समधी जी को गाडी का नंबर दे दिया है. जैसे ही हम लोग बरातघर पहुंचेंगे, सेवा शुरू हो जाएगी. चिल्ली चिकन वगैरह सब.” 
इससे पहले की लल्लन कुछ कह पाते, कमरे में, छोटू, बड़े ही गुस्सैल मूड में घुसा. 
अब थोड़ा सा आपको दूल्हे राजा के बारे में भी बता दे. 
छोटू दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़े थे. पिताजी का बहुत अरमान था कि आईएएस अफसर बने. दो एटेम्पट दे चुके थे. दूसरी बार mains भी क्लीयर हुआ था. इंटरव्यू में वो थोड़ा लड़खड़ा गए थे. पैनल में दो लेडीज़ थी और उनके सामने छोटू जी ने एकदम चुप्पी साध ली थी. 
खैर, mains क्लीयर करने के बाद, पूरे मोहल्ले में उनका बहुत नाम हो गया था. लोग छठवीं-सातवीं के बच्चों को लेकर छोटू के पास करियर एडवाइस मांगने आते थे. 
इन सब चीज़ों से ज़्यादा मैरिज मार्किट में छोटू का वैल्यू बहुत बढ़ गया था. इस साल mains क्लीयर अगले साल कलेक्टर भी बनेगा, पंडित ये बोल बोल कर रिश्ते फिक्स करने की कोशिश कर रहा था. 
प्रोफेसर साहब ने ये सोचा की अभी छोटू का वैल्यू ऊपर है, इसलिए उसे भंजा लेना चाहिए. क्या पता कलेक्टर बने या न बने? प्रोफेसर साहब ने तो शहर के सबसे बड़े आईएएस कोचिंग सेंटर वाले से भी बात कर रखी थी. अगर तीसरा एटेम्पट भी बेकार गया तो छोटू को वहां लगवा देंगे. 
और छोटू की उम्र भी हो रही थी. ऐसे तो तीस साल के थे पर सर्टिफिकेट पर 27 की उम्र थी. इसकी वजह से शादी में प्रॉब्लम भी हो गयी थी. जिस लड़की से बात चल रही थी, उसकी उम्र सर्टिफिकेट पर 28 थी. फिर बातों बातों में पता चला की लड़की असल में 29 की है और मामला सुलझ गया. 
छोटू जी बहुत गरम थे. 
“पापा, आप भी कौन से बैंड वाला लेकर आ गए हैं.”
“क्यों, जमाल बैंड है. हमारी शादी में भी यहीं बजाया था.” 
इससे पहले की छोटू कुछ कह पाता लल्लन बीच में कूद पड़े. 
“क्या बढ़िया बढ़िया गाना बजाता है. आज मेरी यार की शादी है. मेरी देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…” 
“सब पुराना गाना है,” छोटू ने कहा. 
“अरे क्या पुराना है. यही सब गाना पर तो नागिन डांस होता है. अब क्या हम लोग तुमरा शादी में नागिन डांस भी नहीं करेंगे,” लल्लन ने थोड़ा गरम होकर जवाब दिया. 
“पापा, पर दोस्त सब कैसे नाचेगा. वो लोग को ई सब गाना नहीं बुझायेगा.”
“क्या करें फिर?” प्रोफेसर साहब ने पुछा. 
“एक ठो डीजे बुला ले?”
“डीजे?” प्रोफेसर साहब थोड़ी सोच में पड़ गए. “किसको बुलाओगे?”
“अरे पीछे वाली गली मैं पुट्टुवा रहता है ना? 
“कौन पुट्टु? वो जो चार बार एटेम्पट दिया?”
“हाँ वही पापा।”
“डीजे बन गया है आजकल वो?”
“हाँ पापा, बहुत जोरदार बजाता है. डीजे वाले बाबू मेरा गाना चला दे. डीजे वाले बाबू मेरा गाना चला दे.” 
“अच्छा बुला लो.”
प्रोफेसर साहब की इतनी कहने कि देर थी और छोटू उछलते कूदते हुए कमरे से बाहर निकल गया. 
उसके निकलते ही प्रोफेसर साहब ने लल्लन से कहा: “जाओ देखो तुम्हारी दीदी तैयार है कि नहीं.”
“हाँ जीजाजी,” कहकर लल्लन कमरे से निकल गया. 
प्रोफेसर साहब ने अपना मोबाइल फ़ोन निकाला और समधी को फ़ोन लगाया. 
“बस आपका ही इंतज़ार कर रहे हैं,” समधी जी ने जवाब दिया. 
“अच्छा, थोड़ी सी समस्या हो गयी है.”
“क्या समस्या?”  समधी जी ने घबरा कर पुछा, आखिर लड़की की शादी का मामला था.  
“अरे छोटू बाबू को अब डीजे भी चाहिए.”
“तो इस में क्या है. बुला लीजिये. एक ही बार तो हमारी बेटी से शादी करेगा. तो थोड़ा नाच गाना तो होगा ही.”
“धन्यवाद्,” प्रोफेसर साहब ने जवाब दिया.
“अरे आपका बेटा हमारा बेटा।” 
“हम लोग एक घंटे में पहुँच जाएंगे,” ये कहकर प्रोफेसर साहब ने फ़ोन काट दिया. 
प्रोफेसर साहब का फ़ोन काटते ही समधी जी उठे और अपनी पत्नी को खोजते हुए निकले. 
“अरे रश्मी, खाने का 50 प्लेट और कम करना पड़ेगा.”
“काहे?” पत्नी ने थोड़ा इर्रिटेट होकर पुछा. 
“छोटू बाबू को डीजे चाहिए.”
“ओह.” 
“भाई हम आरबीआई में केवल क्लर्क थे, नोट छापने की मशीन आरबीआई के पास है हमारे पास नहीं.”
आधे घंटे बाद. 
छोटू की बारात रोड पर है बरातघर की तरफ, कछुए की रफ़्तार से बढ़ रही है. 
डीजे वाले बाबू तेरा गाना चला दे, बार बार बज रहा है. एक बार डीजे बजा रहा है. एक बार जमाल बैंड. दोनों में प्रतिस्पर्धा चल रही है. 
लल्लन नागिन डांस करने में लगे हुए हैं. पर तोंद इतने निकल गयी है कि कम्बख्त हाथ ज़मीन नहीं छू पा रहे हैं. 
इतने में धमाका टीवी के रिपोर्टर राजू जो वहां से गुज़र रहे हैं, बारात में इतने सारे लोग देख कर चकित रह गए हैं. कोरोना काल में सरकार ने बारात में परमिशन तो केवल 50 लोगों की दी है. पर यहाँ तो कम से कम 200 लोग चल रहे हैं. 
रिपोर्टर राजू माइक लेकर अपने कैमरामैन के साथ जल्दी जल्दी दूल्हे के घोड़े की तरफ भागे. 
छोटू टीवी रिपोर्टर को देखकर बहुत  खुश होता है, घोड़े से नीचे उतरता है उससे बात करने के लिए.
“कितने लोगों का बारात है?” रिपोर्टर राजू पूछता है. 
“अब सर, डेढ़ दू सौ लोग तो जइबे करेगा न बरात में,” मुँह में गुटका दबाये हुए, छोटू जवाब देता है. 
“और अगर इसकी वजह से कोरोना फैल गया तो कौन ज़िम्मेवार होगा?” रिपोर्टर राजू पूछता है. 
“कोरोना वरोना कुछ नहीं है.”
“मतलब?”
“अरे होता तो इतना बड़ा बड़ा रैली करते नेताजी.” 
“एह?”
“और हम अंग्रज़ी अखबार पढ़ते हैं. अभी अभी इंडियन एक्सप्रेस में भल्ला और भसीन ने लिखा कि रैली से कोरोना नहीं फैलता है.”
राजू का सर घूमने लगा. 
“जब रैली से कोरोना नहीं फैलता है तो बारात से कैसे फैलेगा?”
राजू का सर और भी घूमने लगा. 
“सब पप्पू का साज़िश है. वही फैला रहा है ये सब नेगेटिविटी. ज़रा पॉजिटिव बात कीजिये सब अच्छा होगा.”
राजू का सर पूरी तरह से घूम जाता है और अपने कैमरामैन से कहता है: “ज़रा माइक धरो.”
और इसके बाद वो छोटू को पीटने लगता है. 
बारात नाचने में मस्त है, जैसी की शादी न हो मैय्यत में आये हो, और सब के सब लगाए हुए हों. 
जब तक बारात को समझ आता है क्या हो रहा है, लाइव टीवी पर छोटू पिट चूका होता है. 
 
इस कहानी का अंत यहाँ से इंस्पायर्ड है. 

सोचो तो दुनिया बर्बाद हो रही है. और फिर से सोचो तो कुछ नहीं हुआ. 

“ये है विविध भारती. दिन के डेढ़ बजे हैं और आप सुन रहे हैं मनचाहे गीत. आज के पहले गीत को गाया है उषा मंगेशकर ने, संगीत दिया है राम लक्ष्मण ने और गीतकार है रविंद्र रावल. फिल्म है तराना.” 
तभी उषा ताई ने गाना शुरू किया. “सुल्ताना, सुल्ताना, मेरा नाम है सुल्ताना, मेरे हुस्न का हर अंदाज़ मस्ताना.” 
इतने में मेरा मोबाइल फ़ोन बजने लगा और मैं आजकी दुनिया में वापस आया.
चिंटू जी बहुत दिन के बाद फ़ोन कर रहे थे. 
न दुआ न सलाम, सीधे सीधे पॉइंट पर आ गए: “पिताजी नहीं रहे.”
“क्या हुआ?” 
“पता नहीं.”
“पता नहीं?” मैंने पुछा. 
“कल तक तो ठीक हो रहे थे. आज सुबह सुबह अस्पताल से फ़ोन आया.”
“हम्म,” मैं कुछ और नहीं कह पाया.”
“अकेले थे अस्पताल में. मैं यहाँ फसा हुआ हूँ और भैया अलग अस्पताल में भर्ती हैं.”
“तो फिर?” मैंने पूछा. 
 वो समझ गए मैं क्या पूछ रहा था और सीधा सटीक जवाब दिया: “भैया के साले साहब ने अंतिमसंस्कार करवाया. उनका अभी अभी फ़ोन आया था.” 
“अच्छा.” 
“लाइन लगी थी इलेक्ट्रिक क्रेमाटोरियम में. बाइसवी बॉडी थी पिताजी की.”
“हम्म.” 
“साले साहब बहुत ही बुरी स्थिति में है. फूट फूट कर रो रहे थे फ़ोन पर.” 
“बहुत शॉक लगा होगा.”
“बड़ी मुश्किल से चुप कराया.”
“अच्छा.”
“सोचा था, बाहर जाऊँगा. थोड़े पैसे कमाऊंगा और माँ बाप को खुश रखूँगा. सब गड़बड़ हो गया. पिताजी अंत में अकेले रह गए और मैं उनको आखिरी बार भी नहीं देख पाया.” 
“हम्म्म.”
“अच्छा रखता हूँ. भैया का फ़ोन आ रहा है.” 
फ़ोन रखते ही. अमेज़न म्यूजिक पर उषा ताई ने आगे का गाना शुरू किया, एकदम फकीरी अंदाज़ में: “मैं आज यहाँ, कल जाने कहाँ. बंजारों का कब कोई ठिकाना. सुल्ताना, सुल्ताना, मेरा नाम है सुल्ताना, मेरे हुस्न का हर अंदाज़ मस्ताना.”
बायें वाले फ्लैट में कोई मन की बात सुन रहा था. 
नीचे वाले फ्लैट में प्रेशर कुकर बार बार सीटी दे रहा था. लगता है, हर रविवार की तरह आज फिर मटन पक रहा था. 
बाहर बरामदे में, मेरे दायें वाले फ्लैट के बाप और बेटा क्रिकेट खेल रहे थे. 
“शार्ट पिच बोलिंग मत डाल,” बाप ने बेटे से कहा. 
“अरे पर बुमराह आईपीएल में ऐसे ही डालता है,” बेटे ने जवाब दिया. 
क्रिकेट के साथ साथ, एक छोटी लड़की अपनी साइकल को धीरे धीरे बरामदे में चला रही थी. 
नीचे रोड पर कोई पानी की कई बाल्टियां, जो एक लकड़ी के फट्टे पर लदी हुई थी, जिसके नीचे चक्के लगे थे, घसीट कर ले जा रहा था. 
रोड के सामने वर्ली बस स्टैंड में लाउडस्पीकर पर अनाउंसमेंट चालू थी और बसें आ जा रही थी. 
सोचो तो दुनिया बर्बाद हो रही है. और फिर से सोचो तो कुछ नहीं हुआ. 
गाना बदल चुका था. 
उषा ताई जा चुकी थी. हेमलता आ गयी थी. 
“ये आसमान ये बादल ये रास्ते ये हवा, 
हर एक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने से.” 
जो भी कहा जा सकता था, निदा फ़ाज़ली कह गए थे. 
“ये ज़िन्दगी है सफर,
तू सफर की मंज़िल है.”

शर्मा जी, वर्मा जी एंड द रिटर्न ऑफ़ कोरोना

सुबह के साढ़े पांच पौने छे बजे थे. सूरज धीरे धीरे निकलने का प्रयत्न कर रहा था. 
वर्मा जी अपने घर के बगान में गरम पानी लेकर कुर्सी पर अभी अभी बैठे थे. गरम पानी मोशन सुधारने के लिए नहीं था. उसमें वर्मा जी ग्रीन टी का एक बैग डुबोने वाले थे. 
twinings ग्रीन टि का बड़ा डब्बा दो दिन पहले छोटी बहु ने अमेज़न से भिजवाया था.
“पापा आपकी तोंद फिर से निकल आयी है,” बड़े प्यार से वो बोली थी. “थोड़ा सुबह उठकर ग्रीन टी पीजिये.” 
इस पर मिसेज वर्मा खिसिया कर बोली: “हाँ, अब तो आप हमारे हाथ की बनी चाय भी नहीं पियेंगे.” पहले तो केवल बेटे को खो देने का गम था. अब पति भी हाथ से निकला जा रहा था. 
इतने में शर्मा जी अपने घर से पूरी तरह तैयार हो कर सुबह की सैर करने के लिए निकले. और जब लोग मुँह पर दो दो मास्क लगा रहे हैं, उन्होंने ने एक भी लगाने की गुंजाईश नहीं की थी. 
“अरे शर्मा जी मास्क तो लगा लीजिये,” वर्मा जी ने पुकारा. 
“भाई हम दो दिन पहले ही गंगा जी में डुबकी लगाए हैं,” शर्मा जी ने जवाब दिया. 
“अच्छा तब तो ठीक है.”
“हाँ.”
“वैसे भी मिश्रा जी अभी दो दिन पहले…”
“कौन वाला मिश्रा, पान वाला या गुटका वाला?” शर्मा जी ने पुछा. 
“पान वाला.”
“हाँ फिर ठीक है.” 
“क्यों?” वर्मा जी ने पुछा. 
“अरेु ऊ गुटका वाला बहुत थूकता है हर जगह.” 
“अब का करेगा, गुटका का पीक मुंह में थोड़े रखा रहेगा.” 
“छोड़िये. आप क्या कह रहे थे?” शर्मा जी ने पुछा.  
“हाँ तो मिश्रा जी एक ठो फॉरवर्ड भेजे थे व्हाट्सप्प पर.”
“अच्छा.”
“उसमें ऐसा लिखा था कि, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च हुआ है…”  
“अब ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च नहीं होगा तो का रांची यूनिवर्सिटी में होगा?” शर्मा जी ने टोका और फिर अपने ही चुटकुले पर ज़ोर ज़ोर से हसने लगा. “आप भी न वर्मा जी.” 
“अरे आप बोलने तो दीजिये.” 
“अच्छा, बोलिये बोलिये.” 
“तो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में एक ठो रिसर्च हुआ है. उसमें ये पाया गया कि गंगा जी में डुबकी लगाने से बॉडी में ऐसा ऐसा मिनरल आ जाता है, जिससे कोरोना पास भी नहीं आता है, दुरे से निकल लेता है.”
“हम तो बोल ही रहे थे,” शर्मा जी ने कहा. 
“हाँ, पर फिर भी लगा लीजिये, नहीं तो ठोलवा सब पकड़ लेगा.”
“इतना सुबह सुबह?” 
“हे हे.” 
“ऐसे मिशरवा हमको भी एक फॉरवर्ड भेजा था,” शर्मा जी ने कहा. 
“पान वाला या गुटका वाला?” 
“गुटका वाला।” 
“गुटका वाला?”
“हाँ थूकता बहुत हैं, पर फॉरवर्ड अच्छा भेजता हैं.”
“हमको तो नहीं भेजता है.” 
“अरे, आप टेलीग्राम पर हैये नहीं है की.”
“टेलीग्राम? ऊ तो कितने साल से बंद हो गया नहीं?” वर्मा जी ने एकदम आश्चर्यचकित हो कर कहा. 
“अरे, वो वाला नहीं.”
“तो फिर कौन वाला.”
“अभी अभी व्हाट्सप्प जैसा आया है.” 
“व्हाट्सप्प जैसा टेलीग्राम?” वर्मा जी के पल्ले नहीं पड़ रहा था कि शर्मा जी क्या बोल रहे थे. 
“आपके यहाँ कपडा कौन वाशिंग पाउडर में धुलता है?”
“मिसेज़ को तो सर्फ एक्सेल पसंद है. पर बहुत महंगा पड़ता है, इसलिए थोड़ा रिन के साथ मिला देते हैं.”
“हमारी मिसेज़ को अरियल पसंद है.”
“अच्छा.”
“अब जैसे अलग अलग वाशिंग पाउडर आता है…”
“अच्छा अब समझ में आया. टेलीग्राम नया टाइप का व्हाट्सअप है,” वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा. 
“हाँ.”
“तो आप क्या कह रहे थे?” वर्मा जी ने पुछा. 
“तो गुटका वाला मिशरवा एक ठो फॉवर्ड भेजा,”  शर्मा जी बोले. 
“अच्छा.”
“उसमें ये बताया था कि कोरोना जैसा कुछ नहीं है. पूरा का पूरा एक साज़िश है,” शर्मा जी ने कहा. 
“साज़िश? किसका?” 
“सीआईए और बिल गेट्स का.”
“एह. हम तो सुने कि चाइनीज़ लोग चमगादड़-वमगादड़ खाकर इसको फैलाया है.”
“अरे ऊ तो पुराना न्यूज़ है. अभी सुनिए.”
“अच्छा.”
“सीआईए और बिल गेट्स, मिलकर अफवाह फैलाया है कोरोना के बारे में.”
“पर वो लोग ऐसा क्यों करेगा?”
“देखिये सीआईए का तो मालूम नहीं, पर बिल गेट्स का हम समझ सकते हैं.”
“समझ सकते हैं?” वर्मा जी ने पुछा. “कैसे?” 
“अरे, अब इतना पैसा कमा लिया. माइक्रोसॉफ्ट को इतना बड़ा कंपनी बना दिया. तीन ठो बच्चा लोग भी बड़ा हो गया है उसका. घर छोड़ कर जाने के लिए तैयार है.”
“हाँ तो?” वर्मा जी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था. 
“हम लोग के यहाँ तो बच्चा लोग जब घर भी छोड़ता है, तो माँ बाप के बारे में सोचता है. दादा दादी, नाना नानी बनाता है. इसलिए हम लोग का मन लगा रहता है और समय बीतता जाता है.”
“एकदम सही बोले आप शर्मा जी,” वर्मा जी ने कहा. कल रात को ही खबर आयी थी कि उनके सबसे छोटे बेटे चिंटू और उसकी बीवी रिंटू को, इशू होने वाला है. 
“पर अमरीका में इंडिया जैसा वैल्यूज नहीं न है. तो बिल गेट्सवा अब बोर हो गया है. इसलिए सीआईए के साथ मिलकर अफवाह फैला दिया कोरोना के बारे में.” 
“अरे बाप रे.”
“एकदम. मिश्रा जी का फॉरवर्ड कभी गलत नहीं होता है. कोरोना जैसे कुछ नहीं है. और जो है ही नहीं वो किसी को कैसे हो सकता है.”
तभी शर्मा जी के घर के अंदर से आवाज़ आयी. 
“अच्छा सुनते हैं,” मिसेज़ शर्मा बोली. “आधा दर्जन अंडा और एक डबल रोटी भी ले आइयेगा.”
“हाँ ठीक है,” शर्मा जी ने जवाब दिया. 
“अंडा?” वर्मा जी ने पुछा. “आप लोग अभी भी अंडा खाते हैं?” 
“काहे?”
“अरे आप को कोई मेनका गाँधी का अंडे वाला फॉरवर्ड नहीं भेजा क्या आज तक व्हाट्सप्प पर.”