Less Testing is Not Good for Covid Control

Several news reports and long threads on Twitter have pointed out that the number of covid tests across the country have fallen over the last few days. The total number of tests peaked at 19.45 lakh on May 1. They have since fallen to 16.64 lakh as on May 4. Other than not identifying people who have covid and don’t know about it, this is also not good for Covid control 

The following chart plots the total number of tests conducted every day, since May 20, 2020.

Source: https://www.covid19india.org/

Not surprisingly, as the number of covid tests have come down, so have the number of new covid cases. As of April 30, the total number of new covid cases was at 4.02 lakh, with the tests being at 19.2 lakh. They fell to 3.56 lakh as of May 3, when the number of tests fell to 15.05 lakh. As of May 4, the number of new tests stood at 16.64 lakhs, with fresh covid cases being at 3.83 lakh.

The following chart plots the fresh covid cases every day since January 30, 2020.

Source: https://www.covid19india.org/   

The fact that India hasn’t been testing enough has been true for a while now. As Bhramar Mukherjee, Soumik Purkayastha, Maxwell Salvatore and Swapnil Mishra write in The Hindu: “While testing and cases have grown at a comparable rate in the US, in India the growth in reported cases on an average has been nearly five times higher than the growth in testing. India is not testing enough.”

For the Indian case, the data for the period March 28-April 27 has been used, during which much of the recent surge in the number of covid cases has happened.

If we were to follow this method for the period between March 28 and May 4 (the latest data available), we get a similar kind of result. The number of fresh cases has risen at an average weekly rate of 45.98%, whereas testing has grown at 10.67%. This is in line with the point Mukherjee and her co-writers made in their piece in The Hindu. (Of course, it is also obvious looking at the slopes of the curves in the two charts).

If we look at a slightly longer time frame starting from March 1 and up to May 4, the average weekly growth in fresh cases stands at 43.58%, whereas the average weekly growth in number of tests is at 10.31%.

So, what does all this really mean? Let’s look at it pointwise.

1) Low testing leads to a lower number of fresh covid cases. This shows the central government and state governments where this is playing out in good light. With a lower number of fresh cases, they can claim that they are getting the pandemic under control.

2) With the number of cases falling, it also leads to a fall in what is referred to as the reproduction number. As Adam Kucharski writes in The Rules of Contagion, the reproduction number is “the number of new infections we’d expect a typical infectious person to generate on average”.

An estimate made by Sitabhra Sinha from the Institute of Mathematical Sciences in Chennai suggests that the reproduction number for India dropped to 1.16 for the week ending May 3. This is the lowest since March 19, when it was 1.19. Hence, data suggests that the spread of the infection is slowing down, with an average covid patient infecting a lesser number of individuals around him.

Of course, the question is whether this is a genuine drop or simply another manifestation of not enough tests being carried out.

3) The advantage of testing more is that more people who have covid can be identified quickly. This improves the chances of people surviving the disease. But then this is not the only issue at hand, for the government.

As Ryan A Bourne writes in Economics in One Virus: “As economist Alex Tabarrok has explained, there’s good reason to think that there is an inverted-U shape of Covid-19 cases as testing numbers increase. At first, conducting more tests leads to finding additional cases.” Of course, this makes governments look bad in the short run. And governments obsessed with narrative want to control the growing number of fresh covid cases, this way or that way.  

4) Other than increasing the chances of survival, testing also slows down the spread of the epidemic. As Bourne writes: “When testing is widespread and regular enough, conducting more tests actually reduces Covid-19 cases…[as]… potentially infectious people can isolate themselves immediately and notify those they have been in contact with sooner.”

What this does is it minimizes “the window of transmission between people becoming infectious and ultimately isolating—the time the person would likely be out spreading the disease.”

It leads to a genuine slowdown in the transmission of the disease and not just a slowdown at the data level. Hence, it is important that the governments keep encouraging testing.

कोरोना काल में छोटू बाबू की बड़ी शादी

शाम के पौने सात बजे थे. बिजली कटी हुई थी. पूरी गली में अँधेरा छाया हुआ था. 
पर प्रोफेसर पी के श्रीवास्तव का घर दूधिया रोशनी में समझो नहा सा रहा था. उनके बड़े बेटे छोटू की शादी थी. 
अमूमन तो छोटे बेटे का नाम छोटू रखा जाता है. पर यहां हुआ ऐसा था कि जब छोटू पैदा हुआ तो वो इतना छोटा था कि लोगों ने उसका नाम छोटू रख दिया. भाई मोहल्ले का भी कुछ हक़ तो बनता ही था प्रोफेसर साहब पर. 
खैर फ़िलहाल छोटू को रहने दीजिये, काम की बात करते हैं. 
पूरी गली में अँधेरा था तो प्रोफेसर सब घर टिमटिमा कैसे रहा था? उसके लिए आपको प्रोफेसर साहब के छोटे साले लल्लन को धन्यवाद देना पड़ेगा. लल्लन जी ने पीछे के फेज से बिजली खींच ली थी. अगर बिजली खींचने में कोई यूनिवर्सिटी पीएचडी वगैरह देती है तो लल्लन को तो ज़रूर मिलना चाहिए. 
“बहुत बढ़िया बिजली खींचे हो लल्लन,” प्रोफेसर साहब ने लल्लन से कहा. 
लल्लन ने इसका जवाब अजीब तरह से मुस्कुरा के दिया. ये वैसी ही मुस्कराहट थी जो मिडिल एज्ड भारतीय आदमियों में अक्सर पायी जाती है, जब वो कुछ कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते हैं. 
“क्या हुआ?” प्रोफेसर साहब ने पुछा. वो समझ गए कि लल्लन कुछ कहना चाह रहा है. 
“जीजाजी वो व्यवस्था हो गयी है ना?” लल्लन ने एकदम लजा लजा के पुछा, जैसे की किसी की शादी में पहली बार दारु पीने वाले हों. 
“हाँ, आखरी वाली कार में सब रखवा दिया है. ओल्ड मोंक, वैट 69, सब कुछ.” 
“और चखना वगैरह?”
“उसका भी बंदोबस्त हो गया है. समधी जी को गाडी का नंबर दे दिया है. जैसे ही हम लोग बरातघर पहुंचेंगे, सेवा शुरू हो जाएगी. चिल्ली चिकन वगैरह सब.” 
इससे पहले की लल्लन कुछ कह पाते, कमरे में, छोटू, बड़े ही गुस्सैल मूड में घुसा. 
अब थोड़ा सा आपको दूल्हे राजा के बारे में भी बता दे. 
छोटू दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़े थे. पिताजी का बहुत अरमान था कि आईएएस अफसर बने. दो एटेम्पट दे चुके थे. दूसरी बार mains भी क्लीयर हुआ था. इंटरव्यू में वो थोड़ा लड़खड़ा गए थे. पैनल में दो लेडीज़ थी और उनके सामने छोटू जी ने एकदम चुप्पी साध ली थी. 
खैर, mains क्लीयर करने के बाद, पूरे मोहल्ले में उनका बहुत नाम हो गया था. लोग छठवीं-सातवीं के बच्चों को लेकर छोटू के पास करियर एडवाइस मांगने आते थे. 
इन सब चीज़ों से ज़्यादा मैरिज मार्किट में छोटू का वैल्यू बहुत बढ़ गया था. इस साल mains क्लीयर अगले साल कलेक्टर भी बनेगा, पंडित ये बोल बोल कर रिश्ते फिक्स करने की कोशिश कर रहा था. 
प्रोफेसर साहब ने ये सोचा की अभी छोटू का वैल्यू ऊपर है, इसलिए उसे भंजा लेना चाहिए. क्या पता कलेक्टर बने या न बने? प्रोफेसर साहब ने तो शहर के सबसे बड़े आईएएस कोचिंग सेंटर वाले से भी बात कर रखी थी. अगर तीसरा एटेम्पट भी बेकार गया तो छोटू को वहां लगवा देंगे. 
और छोटू की उम्र भी हो रही थी. ऐसे तो तीस साल के थे पर सर्टिफिकेट पर 27 की उम्र थी. इसकी वजह से शादी में प्रॉब्लम भी हो गयी थी. जिस लड़की से बात चल रही थी, उसकी उम्र सर्टिफिकेट पर 28 थी. फिर बातों बातों में पता चला की लड़की असल में 29 की है और मामला सुलझ गया. 
छोटू जी बहुत गरम थे. 
“पापा, आप भी कौन से बैंड वाला लेकर आ गए हैं.”
“क्यों, जमाल बैंड है. हमारी शादी में भी यहीं बजाया था.” 
इससे पहले की छोटू कुछ कह पाता लल्लन बीच में कूद पड़े. 
“क्या बढ़िया बढ़िया गाना बजाता है. आज मेरी यार की शादी है. मेरी देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…” 
“सब पुराना गाना है,” छोटू ने कहा. 
“अरे क्या पुराना है. यही सब गाना पर तो नागिन डांस होता है. अब क्या हम लोग तुमरा शादी में नागिन डांस भी नहीं करेंगे,” लल्लन ने थोड़ा गरम होकर जवाब दिया. 
“पापा, पर दोस्त सब कैसे नाचेगा. वो लोग को ई सब गाना नहीं बुझायेगा.”
“क्या करें फिर?” प्रोफेसर साहब ने पुछा. 
“एक ठो डीजे बुला ले?”
“डीजे?” प्रोफेसर साहब थोड़ी सोच में पड़ गए. “किसको बुलाओगे?”
“अरे पीछे वाली गली मैं पुट्टुवा रहता है ना? 
“कौन पुट्टु? वो जो चार बार एटेम्पट दिया?”
“हाँ वही पापा।”
“डीजे बन गया है आजकल वो?”
“हाँ पापा, बहुत जोरदार बजाता है. डीजे वाले बाबू मेरा गाना चला दे. डीजे वाले बाबू मेरा गाना चला दे.” 
“अच्छा बुला लो.”
प्रोफेसर साहब की इतनी कहने कि देर थी और छोटू उछलते कूदते हुए कमरे से बाहर निकल गया. 
उसके निकलते ही प्रोफेसर साहब ने लल्लन से कहा: “जाओ देखो तुम्हारी दीदी तैयार है कि नहीं.”
“हाँ जीजाजी,” कहकर लल्लन कमरे से निकल गया. 
प्रोफेसर साहब ने अपना मोबाइल फ़ोन निकाला और समधी को फ़ोन लगाया. 
“बस आपका ही इंतज़ार कर रहे हैं,” समधी जी ने जवाब दिया. 
“अच्छा, थोड़ी सी समस्या हो गयी है.”
“क्या समस्या?”  समधी जी ने घबरा कर पुछा, आखिर लड़की की शादी का मामला था.  
“अरे छोटू बाबू को अब डीजे भी चाहिए.”
“तो इस में क्या है. बुला लीजिये. एक ही बार तो हमारी बेटी से शादी करेगा. तो थोड़ा नाच गाना तो होगा ही.”
“धन्यवाद्,” प्रोफेसर साहब ने जवाब दिया.
“अरे आपका बेटा हमारा बेटा।” 
“हम लोग एक घंटे में पहुँच जाएंगे,” ये कहकर प्रोफेसर साहब ने फ़ोन काट दिया. 
प्रोफेसर साहब का फ़ोन काटते ही समधी जी उठे और अपनी पत्नी को खोजते हुए निकले. 
“अरे रश्मी, खाने का 50 प्लेट और कम करना पड़ेगा.”
“काहे?” पत्नी ने थोड़ा इर्रिटेट होकर पुछा. 
“छोटू बाबू को डीजे चाहिए.”
“भाई हम आरबीआई में केवल क्लर्क थे, नोट छापने की मशीन आरबीआई के पास है हमारे पास नहीं.”
आधे घंटे बाद. 
छोटू की बारात रोड पर है बरातघर की तरफ, कछुए की रफ़्तार से बढ़ रही है. 
डीजे वाले बाबू तेरा गाना चला दे, बार बार बज रहा है. एक बार डीजे बजा रहा है. एक बार जमाल बैंड. दोनों में प्रतिस्पर्धा चल रही है. 
लल्लन नागिन डांस करने में लगे हुए हैं. पर तोंद इतने निकल गयी है कि कम्बख्त हाथ ज़मीन नहीं छू पा रहे हैं. 
इतने में धमाका टीवी के रिपोर्टर राजू जो वहां से गुज़र रहे हैं, बारात में इतने सारे लोग देख कर चकित रह गए हैं. कोरोना काल में सरकार ने बारात में परमिशन तो केवल 50 लोगों की दी है. पर यहाँ तो कम से कम 200 लोग चल रहे हैं. 
रिपोर्टर राजू माइक लेकर अपने कैमरामैन के साथ जल्दी जल्दी दूल्हे के घोड़े की तरफ भागे. 
छोटू टीवी रिपोर्टर को देखकर बहुत  खुश होता है, घोड़े से नीचे उतरता है उससे बात करने के लिए.
“कितने लोगों का बारात है?” रिपोर्टर राजू पूछता है. 
“अब सर, डेढ़ दू सौ लोग तो जइबे करेगा न बरात में,” मुँह में गुटका दबाये हुए, छोटू जवाब देता है. 
“और अगर इसकी वजह से कोरोना फैल गया तो कौन ज़िम्मेवार होगा?” रिपोर्टर राजू पूछता है. 
“कोरोना वरोना कुछ नहीं है.”
“अरे होता तो इतना बड़ा बड़ा रैली करते नेताजी.” 
“और हम अंग्रज़ी अखबार पढ़ते हैं. अभी अभी इंडियन एक्सप्रेस में भल्ला और भसीन ने लिखा कि रैली से कोरोना नहीं फैलता है.”
राजू का सर घूमने लगा. 
“जब रैली से कोरोना नहीं फैलता है तो बारात से कैसे फैलेगा?”
राजू का सर और भी घूमने लगा. 
“सब पप्पू का साज़िश है. वही फैला रहा है ये सब नेगेटिविटी. ज़रा पॉजिटिव बात कीजिये सब अच्छा होगा.”
राजू का सर पूरी तरह से घूम जाता है और अपने कैमरामैन से कहता है: “ज़रा माइक धरो.”
और इसके बाद वो छोटू को पीटने लगता है. 
बारात नाचने में मस्त है, जैसी की शादी न हो मैय्यत में आये हो, और सब के सब लगाए हुए हों. 
जब तक बारात को समझ आता है क्या हो रहा है, लाइव टीवी पर छोटू पिट चूका होता है. 
इस कहानी का अंत यहाँ से इंस्पायर्ड है. 

शर्मा जी, वर्मा जी एंड द रिटर्न ऑफ़ कोरोना

सुबह के साढ़े पांच पौने छे बजे थे. सूरज धीरे धीरे निकलने का प्रयत्न कर रहा था. 
वर्मा जी अपने घर के बगान में गरम पानी लेकर कुर्सी पर अभी अभी बैठे थे. गरम पानी मोशन सुधारने के लिए नहीं था. उसमें वर्मा जी ग्रीन टी का एक बैग डुबोने वाले थे. 
twinings ग्रीन टि का बड़ा डब्बा दो दिन पहले छोटी बहु ने अमेज़न से भिजवाया था.
“पापा आपकी तोंद फिर से निकल आयी है,” बड़े प्यार से वो बोली थी. “थोड़ा सुबह उठकर ग्रीन टी पीजिये.” 
इस पर मिसेज वर्मा खिसिया कर बोली: “हाँ, अब तो आप हमारे हाथ की बनी चाय भी नहीं पियेंगे.” पहले तो केवल बेटे को खो देने का गम था. अब पति भी हाथ से निकला जा रहा था. 
इतने में शर्मा जी अपने घर से पूरी तरह तैयार हो कर सुबह की सैर करने के लिए निकले. और जब लोग मुँह पर दो दो मास्क लगा रहे हैं, उन्होंने ने एक भी लगाने की गुंजाईश नहीं की थी. 
“अरे शर्मा जी मास्क तो लगा लीजिये,” वर्मा जी ने पुकारा. 
“भाई हम दो दिन पहले ही गंगा जी में डुबकी लगाए हैं,” शर्मा जी ने जवाब दिया. 
“अच्छा तब तो ठीक है.”
“वैसे भी मिश्रा जी अभी दो दिन पहले…”
“कौन वाला मिश्रा, पान वाला या गुटका वाला?” शर्मा जी ने पुछा. 
“पान वाला.”
“हाँ फिर ठीक है.” 
“क्यों?” वर्मा जी ने पुछा. 
“अरेु ऊ गुटका वाला बहुत थूकता है हर जगह.” 
“अब का करेगा, गुटका का पीक मुंह में थोड़े रखा रहेगा.” 
“छोड़िये. आप क्या कह रहे थे?” शर्मा जी ने पुछा.  
“हाँ तो मिश्रा जी एक ठो फॉरवर्ड भेजे थे व्हाट्सप्प पर.”
“उसमें ऐसा लिखा था कि, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च हुआ है…”  
“अब ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च नहीं होगा तो का रांची यूनिवर्सिटी में होगा?” शर्मा जी ने टोका और फिर अपने ही चुटकुले पर ज़ोर ज़ोर से हसने लगा. “आप भी न वर्मा जी.” 
“अरे आप बोलने तो दीजिये.” 
“अच्छा, बोलिये बोलिये.” 
“तो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में एक ठो रिसर्च हुआ है. उसमें ये पाया गया कि गंगा जी में डुबकी लगाने से बॉडी में ऐसा ऐसा मिनरल आ जाता है, जिससे कोरोना पास भी नहीं आता है, दुरे से निकल लेता है.”
“हम तो बोल ही रहे थे,” शर्मा जी ने कहा. 
“हाँ, पर फिर भी लगा लीजिये, नहीं तो ठोलवा सब पकड़ लेगा.”
“इतना सुबह सुबह?” 
“हे हे.” 
“ऐसे मिशरवा हमको भी एक फॉरवर्ड भेजा था,” शर्मा जी ने कहा. 
“पान वाला या गुटका वाला?” 
“गुटका वाला।” 
“गुटका वाला?”
“हाँ थूकता बहुत हैं, पर फॉरवर्ड अच्छा भेजता हैं.”
“हमको तो नहीं भेजता है.” 
“अरे, आप टेलीग्राम पर हैये नहीं है की.”
“टेलीग्राम? ऊ तो कितने साल से बंद हो गया नहीं?” वर्मा जी ने एकदम आश्चर्यचकित हो कर कहा. 
“अरे, वो वाला नहीं.”
“तो फिर कौन वाला.”
“अभी अभी व्हाट्सप्प जैसा आया है.” 
“व्हाट्सप्प जैसा टेलीग्राम?” वर्मा जी के पल्ले नहीं पड़ रहा था कि शर्मा जी क्या बोल रहे थे. 
“आपके यहाँ कपडा कौन वाशिंग पाउडर में धुलता है?”
“मिसेज़ को तो सर्फ एक्सेल पसंद है. पर बहुत महंगा पड़ता है, इसलिए थोड़ा रिन के साथ मिला देते हैं.”
“हमारी मिसेज़ को अरियल पसंद है.”
“अब जैसे अलग अलग वाशिंग पाउडर आता है…”
“अच्छा अब समझ में आया. टेलीग्राम नया टाइप का व्हाट्सअप है,” वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा. 
“तो आप क्या कह रहे थे?” वर्मा जी ने पुछा. 
“तो गुटका वाला मिशरवा एक ठो फॉवर्ड भेजा,”  शर्मा जी बोले. 
“उसमें ये बताया था कि कोरोना जैसा कुछ नहीं है. पूरा का पूरा एक साज़िश है,” शर्मा जी ने कहा. 
“साज़िश? किसका?” 
“सीआईए और बिल गेट्स का.”
“एह. हम तो सुने कि चाइनीज़ लोग चमगादड़-वमगादड़ खाकर इसको फैलाया है.”
“अरे ऊ तो पुराना न्यूज़ है. अभी सुनिए.”
“सीआईए और बिल गेट्स, मिलकर अफवाह फैलाया है कोरोना के बारे में.”
“पर वो लोग ऐसा क्यों करेगा?”
“देखिये सीआईए का तो मालूम नहीं, पर बिल गेट्स का हम समझ सकते हैं.”
“समझ सकते हैं?” वर्मा जी ने पुछा. “कैसे?” 
“अरे, अब इतना पैसा कमा लिया. माइक्रोसॉफ्ट को इतना बड़ा कंपनी बना दिया. तीन ठो बच्चा लोग भी बड़ा हो गया है उसका. घर छोड़ कर जाने के लिए तैयार है.”
“हाँ तो?” वर्मा जी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था. 
“हम लोग के यहाँ तो बच्चा लोग जब घर भी छोड़ता है, तो माँ बाप के बारे में सोचता है. दादा दादी, नाना नानी बनाता है. इसलिए हम लोग का मन लगा रहता है और समय बीतता जाता है.”
“एकदम सही बोले आप शर्मा जी,” वर्मा जी ने कहा. कल रात को ही खबर आयी थी कि उनके सबसे छोटे बेटे चिंटू और उसकी बीवी रिंटू को, इशू होने वाला है. 
“पर अमरीका में इंडिया जैसा वैल्यूज नहीं न है. तो बिल गेट्सवा अब बोर हो गया है. इसलिए सीआईए के साथ मिलकर अफवाह फैला दिया कोरोना के बारे में.” 
“अरे बाप रे.”
“एकदम. मिश्रा जी का फॉरवर्ड कभी गलत नहीं होता है. कोरोना जैसे कुछ नहीं है. और जो है ही नहीं वो किसी को कैसे हो सकता है.”
तभी शर्मा जी के घर के अंदर से आवाज़ आयी. 
“अच्छा सुनते हैं,” मिसेज़ शर्मा बोली. “आधा दर्जन अंडा और एक डबल रोटी भी ले आइयेगा.”
“हाँ ठीक है,” शर्मा जी ने जवाब दिया. 
“अंडा?” वर्मा जी ने पुछा. “आप लोग अभी भी अंडा खाते हैं?” 
“अरे आप को कोई मेनका गाँधी का अंडे वाला फॉरवर्ड नहीं भेजा क्या आज तक व्हाट्सप्प पर.” 

मिसेज़ शर्मा, मिसेज़ वर्मा एंड द रिटर्न ऑफ़ कोरोना 

शाम के छे-साढ़े छे बजे हैं. सूरज ढल चुका है. कोरोना की दूसरी वेव का प्रकोप शहर में फैल चुका है. ऐसे माहौल में, मिसेज़ शर्मा और मिसेज़ वर्मा अपने अपने घर के सामने छोटे से बगान में बैठी हुईं, सोशल डिस्टन्सिंग बनाये हुए, एक दुसरे से बातें कर रही हैं. 
आईये सुनते हैं. 
“और आप सूई ले लीं? मिसेज़ शर्मा ने पुछा. 
“अब क्या बताएं,” मिसज़ वर्मा ने जवाब दिया. “अरे परसों मिस्टर और हम गए थे. अस्पताल पहुंचे तो Compounder मिस्टर से बोलिस, आज तो ख़तम हो गया है सर.” 
“ख़तम, ख़तम कैसे हो गया?”
“हम भी वही बोले.” 
“तब तो टीका उत्सव चल रहा था न.”
“हम भी वही बोले.” 
“मोदी जी दिन में 18 घंटे काम कर रहे हैं और ई सब compounder लोग से दू ठो सुई नहीं संभल रहा है.”
“हम भी वही बोले,” मिसेज़ वर्मा ये बोलकर जैसे अटक सी गयी. 
“और आपका चुन्नू ठीक है?” मिसेज़ शर्मा ने पुछा. 
“हाँ ठीक ही है,” मिसेज़ वर्मा का जवाब आया. 
“और इशू–विशु के बारे में कुछ सोचा कि नहीं?”
“अरे क्या बताएं,” मिसेज़ वर्मा बोलीं. 
“ऐसे अभी तो टाइम भी सही था,”  मिसेज़ शर्मा बोली. 
“सबका वर्क फ्रॉम होम चल रहा है.”
“हाँ तो?”
“अरे आदमी घर से काम करता है तो थकता कम हैना. ज़्यादा ताकत रहता है ” 
“अच्छा समझे.”
“ऐसे तुमको एक बात बोलेंगे, बुरा मत मानना.” 
“अरे नहीं बोलिये, बुरा काहे मानेंगे, ” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
“हमारी मंझली दीदी का लड़का हैना.”
“कौन बबलू?” 
“हाँ. तो वो भी बहुत दिन तक इशू नहीं किया.” 
“अच्छा फिर?”
“फिर क्या, दवाई का आदत लग गया. बहुत मुश्किल से हुआ.” 
“अरे बाप रे.” 
“इस लिए समय रहते कर लेना चाहिए,” मिसेज़ शर्मा ने कहा. “हर चीज़ का एक उम्र होता है.” 
“ऐसे हम परसों ही पूछे उससे कि क्या प्लान है,” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
“क्या बोला?”
“बोला, मम्मी ऐसी दुनिया में बच्चा लाकर क्या मतलब.”
“हम समझाये, के बेटा, बच्चा कोई मतलब के लिए थोड़े पैदा करता है. बच्चा पैदा करना होता है, इसलिए पैदा करता है.”
“अच्छा. फिर क्या बोला?” मिसेज़ शर्मा ने पूछा. 
“बोला, मम्मी तुम समझ रही हो क्या बोल रही हो.”
“ओह, ऐसा बोल दिया.” 
“हम तो तुमको बोले थे, जेनयू वेनयू मत भेजो. बच्चा लोग घर से बहार डॉक्टर इंजीनियर बनने के लिए निकले तो अच्छा लगता है. हिस्ट्री पढ़ने के लिए इतना मेहनत…” 
“हाँ आप तो बोली थी. और हम भी मिस्टर को बोले थे. पर वो उधर से बोले, कब तक अपने पास बांध के रखोगी,” मिसेज़ वर्मा ने कहा.
“ऐ माँ, गाय है क्या जो बांध कर रखेंगे.”
“सही कहीं आप.” 
“हमारी बड़ी दीदी का लड़का…”
“हाँ. वो भी जेनयू गया था, करीब दस साल पहले.” 
“बस बंगाली लड़की से शादी कर लिया.” 
“अरे बाप रे. बहुत एग्रेसिव होगी वो तो?”
“हैये है कि. कच्चा चबा गयी अपनी सास को,” मिसेज़ शर्मा ने कहा.
“दीदी और जीजाजी आपके मान कैसे गए?” मिसेज़ वर्मा ने पूछा.
“शुरू में नहीं माने थे. फिर चिंटू बोला, शादी कर रहे हैं, आना है तो आईये, नहीं तो भाड़ में जाईये.”
“बच्चा लोग के सामने आदमी मजबूर हो जाता है.”
“एकदम. हम तभी राजू को जेनयू नहीं भेजे. बोले यहीं रांची यूनिवर्सिटी में पढ़ लो.” 
“एकदम ठीक की.” 
“तभी मोदी जी कहते हैं, हार्डवर्क इस मोर इम्पोर्टेन्ट दैन हारवर्ड,” मिसेज़ शर्मा ने कहा. 
“कहेंगे नहीं. वो तो पूरा पोलिटिकल साइंस पढ़े हैं,” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
तभी मिसेज़ वर्मा के घर के अंदर से आवाज़ आयी. “शीला, गप मारना ख़तम करो. भूक लगी है. डिनर दे दो.” 
“मिस्टर बुला रहे हैं लगता है?” मिसेज़ शर्मा ने कहा. 
“पर पौने सात बजे डिनर?”
“अब क्या बताएं.” 
“क्या हुआ?”
“अरे छोटी बहु बोल दी है कि पापा आपका तोंद निकल गया है. अच्छा नहीं लग रहा है.” 
“ओह चुन्नू की मिसेज़ ऐसा बोल दी.” 
“इसलिए, आजकल जल्दी खा रहे हैं…उसको का बोलते हैं.” 
“इंटरमिटेंट फास्टिंग.” 
“हाँ वही करने की कोशिश कर रहे हैं.”
“इनको न हमेशा से मन था कि एक बेटी भी हो,” मिसेज़ वर्मा ने थोड़ा शर्मा के कहा. “इस लिए छोटी बहु का बात इतना ध्यान से सुनते हैं.” 
“तीन लड़का के बाद, बोले एक बार और ट्राई करते हैं, हो सकता है इस बार बेटी हो जाए.” 
“पर हम हाथ खड़ा कर दिए.”
“बोले, और ताकत नहीं है.” 
“पहले ही तीन बच्चा संभालना…” 
“शीला,” मिसेज वर्मा के घर के अंदर से फिर आवाज़ आयी. 
“अच्छा तो हम चलते हैं,” मिसेज़ वर्मा ने कहा. 
“फिर कब मिलयेगा?” मिसेज़ शर्मा ने पुछा. 
“जब आप कहियेगा.” 
“जुम्मे रात को?”
“नहीं आधी रात को.”

“Swami Vivekananda was a rockstar before they had a term like that”

Rohit Deshpandé is the Sebastian S. Kresge Professor of Marketing at Harvard Business School where he currently teaches in the Owner/President Management Program and in other executive education offerings. He has also taught global branding, international marketing, and first year marketing in the MBA program. In this interview to Vivek Kaul he talks about the provenance paradox, as to how companies from emerging markets find it very difficult to establish their brands globally, even though they have both the human as well capital resources required for such an effort.
What is provenance paradox?
I have been interested in looking at the marketing problems of companies from emerging nations. The background is my previous work profiling the most successful companies in the world and doing that I found that these successful companies came from the developed world.  So they came from the United States, they came from Europe and Japan and so on.  The next phase was to identify who the next great multinationals are going to be. And my intuition was that they are not going to come from the developed world but they are going to come from the developing world given that they are hungrier, they are more innovative, and many of them have huge domestic markets, which is how these other companies from the developed world that I studied got started. They had access to big domestic markets.
What happened next?
When I started doing that work the marketing challenge that I found was a branding one. These companies from emerging markets wanted to build global brands and for some reason had difficulty doing it. So if you look at any ranking of the top 50 or the top 25 global brands, the BRIC nations (Brazil, Russia, India and China) are conspicuously absent, which is surprising because countries like Brazil, China and India, and to some extent Russia, have significant resources they can expend. This includes human resources as well capital resources. So it doesn’t seem to be a question of money.
Expend on building a brand you mean?
Yes. Expend on building the brand. That’s the barrier. It is not a question of ambition. It was a paradox and I couldn’t understand it. These are aspiratonal, ambitious, well resourced companies that don’t seem to be able to build global brands. Or at least not yet. One hypothesis when I was initially presenting this work was that people said that it takes a long time to build a global brand and that’s why. And it turns out that if you look at the top brands there are some that have come up in the last five years. On the technology side Facebook is a company that has built a global brand fairly recently. Google, has build a global brand in quick time.
Even a company like Apple which was down in the dumps…
Has risen to the top, number two, number three rank now. Excellent example. So it’s not a question of time. There is something else going on. The other thing that I noticed was that there is like a small area around Milan in Italy that has a bunch of them and they all happen to be in fashion, Armani, Versace and so on. And so I came to the provenance paradox. Why is it that when you say Made in Brazil or Made in India or Made in China people somehow discount? Is this soft racism? And that is one possibility. The fact that something is coming from China or from India, makes people say that it is just not good enough.
Even in India we don’t look up upon something that says Made in China…
The funny thing is that even in China they don’t look up to Made in China. You want to hear a story?
I was talking to the person who runs the Asian operations for Prada. She was telling me that they are running short of artisans in Italy who can work with leather, silk and so on, to make purses. They have lost a generation of young people in Italy who have gone to work in factories. She said that the place that we find them is in China. They have retained these skills and they are cheap. The problem is she said that if it is a Prada bag or Prada shoes, that says Made in China, not only will they not buy it in Europe, the women don’t buy them in China  as well. So extremely affluent women in China will not buy Made in China. So yes this provenance paradox is a real problem and it’s a problem within the countries itself.
Can you give us some examples of the provenance paradox?
One of the first ones I encountered was Café Columbia, which is a social enterprise of the federation of national coffee growers in Columbia. The coffee growers have small plot of lands. So they formed a federation to help them market the product because they did not have the resources to market the product. These guys realised very quickly that they have a problem because they wanted to export and Columbia is seen as the exporter of the other “cash” crop. So in a country like the US which is the largest coffee consuming market in the world they couldn’t get any real penetration.
What did they do?
They hired an advertising agency on the Madison Avenue to create an advertising campaign around this fictitious coffee grower from Columbia called Juan Valdez who took great care of the coffee beans and picked up the best ones as he wandered through the hills. People developed a tremendous affection to this character and which passed onto the brand. They build something called 100% Columbian Coffee which is the brand. They had the country of origin in the name of the brand. And it’s an ingredient brand, meaning, that they don’t sell to retailers directly. They sold it to Nestle, who would put it into their Nescafe brand of coffee and said Nescafe 100% Columbian.
Any other example?
Let me give you another example that is very different. Corona beer. Does Corona sell here?
The advertising for Corona doesn’t mention the country of origin, which is Mexico, at all. In fact what they do is they play off this whole lifestyle theme of vacation on the beach. The creative strategy for their advertising is sun, fun, beach, and vacation in a bottle. They have been extremely successful with it. People project themselves into those ads. The beach doesn’t have to be in Cancun (a seaside city with beaches, situated in Mexico). It could be in Riviera. It could be in Kerala. It could be anywhere in the world. But they built a successful brand by not saying anything about the provenance (i.e. the country of origin) and it is intentional. That’s what they wanted to do. They did not want to be clubbed with other Mexican beers which tend to be cheap. These guys price premium and they price the same level as Heineken in the US. And Heineken had been the number one imported beer brand in the US for fifty years since prohibition. They overtook them.
Any other example?
The third one is a case study that I have just finished and which I am teaching for the first time here tomorrow. It’s on Infosys. I knew that they had built a global technology brand but they had spent hardly anything on marketing or on advertising. In fact they don’t spend any money on advertising. I said how is it possible?  When I looked at their space there are other companies in that space which are spending a lot. Like there major competitors would be IBM and Accenture for instance, and they are spending tonnes and tonnes of money. These guys don’t spend.
So what do they do?
What they do is that they build personal relationships with their buyers, which is just amazing. They narrow cast this thing down. They know there target market very well which is really few companies. They know that there are five people who make purchase decisions within IT and they go after those people.  There information systems are just fantastic. They are serving clients who compete with each other on different floors of the same building. Just think about the security issues here. The amount of trust that they have engendered is absolutely fantastic. They build a trust mark and not a trademark.
Examples that you have given till now are on the positive side. Can you give us some examples on the negative side?
There are several companies that have had a really really hard time building a global brand. I have written a case study about the number one ultra premium vodka from Russia. It’s called Russian Standard. They have not been successful in the US market. A product called Grey Goose, one of the successful vodkas in the US, comes from France. Then there is Absolut which comes from Sweden. There is a product called Chopin which comes from Poland. They are all really good expensive Vodkas but they don’t come from Russia. So these guys said provenance is so important because people should know that vodka should be Russian. They are drinking French vodka. French champagne is okay. But French vodka? But Russian Standard has had a hard time. Americans are either not comfortable drinking a Russian product and still feel a little jingoistic about this. Or they don’t care where the product comes from.
Any Indian examples?
The Tatas have been trying to build a global brand. There issue is that they have so many different companies and they all have different brands. Let me talk about Taj Hotels. In the US they have acquired three properties. They acquired the old Ritz-Carlton in Boston and rebadged it. They acquired The Campton House in San Francisco and rebadged it. So the two hotels became the Taj San Francisco and Taj Boston. And they acquired The Pierre in Manhattan and it is still The Pierre because the co-op that owns it refused to allow the world Taj on it. So it’s the Pierre, a Taj Hotel company or something like that. And then it’s a Tata company. So there are three brands. There is The Pierre, there is the Taj and it is to be called a Tata Enterprise as the case is with all the Tata companies.
So they have got a problem then?
I remember talking to Ratan Tata once and he was talking about the acquisition of Tetley, a very huge Tata Tea enterprise. Should it be Tata Tetley or will that damage the Tetley brand?  They acquired Land Rover and Jaguar and they have been in automotive for a very long time. Should they be badging it Tata Land Rover? From your face you have already expressed an opinion, which I think they share. So they have had a problem building a global brand. When you grown by acquisition you acquire some brands that have their own equity, do you impose your own brand on them or you connect it in some way. It’s not that it cannot be done. Lenovo did it as an example of a Chinese brand because they moved out of Thinkpad which they used to make.
Since we have been talking about the Tatas, do you think the Tata Nano as and when it does manage to go abroad will face the provenance paradox despite all the publicity that it got initially?
The Nano will certainly encounter the provenance paradox and it’s a question of how they are going to get around it.  Geely, which is one of the largest Chinese automobile companies, has had a hard time penetrating outside China . So what they did was that they bought Volvo, which is a very well known Swedish company and they now have dealerships that sell both Geely and Volvo. The hope is that by association people will associate Geely with quality which is what Volvo is all about. Volvo is known for safety, durability and quality. Whether it will work or not we don’t know.
Something like a Yoga which has been a very successful Indian export to the US. Why did that not encounter any provenance paradox?
The story of yoga in the US goes back to Swami Vivekananda. He was the one who popularized India, Indian philosophy, Hinduism, eastern spirituality and a part of that was yoga. It had to do with meditation. It had to do with breathing. It was more of pranayam rather than the asanas. When he came to America he was so charismatic. He was a rockstar before they had a term like that. There would be audiences overflowing in Chicago, Los Angeles, New York etc. They would come to his lectures. He would be wearing a saffron robe and a turban and he would talk about his stuff. For the intelligentsia and the affluent it became a kind of a chic thing to explore India. This is way before the Beatles came to India for Maharishi Yoga.
This was the late 19th century…
So this was how it got started. Now fast forward to the last ten years or so. Yoga devotees in the US are largely the women. It is seen as a form of exercise that is low body stress, very healthy, and more natural exercise than what had been popular before and to some extent and still is, which is aerobics. Before that it was running. So yoga is seen as a better form of exercise than those and that is a big part of why yoga became popular. It does not anymore have a connection with Hinduism. And therefore not as much of a connection with India. So provenance has been disconnected from yoga.
And that has happened over a long time period of time?
It has happened over a long period of time but the popularity of yoga is relatively recent. It is now a $6billion per year industry in the US. And it’s a pyramid and only a few people at the top are doing very well. And there are lots of yoga teachers who are working out of a mall and who are eking out a living, but they don’t make much money. An example of someone who has done really well is Bikram yoga. I don’t know if you know Bikram Choudhury. So he has this particular kind. It has to be at a certain temperature. It is only 26 asanas. Then there is Tara Stiles. She is Deepak Chopra’s yoga teacher. She doesn’t say anything in Sanskrit. It is very new age. She uses social media a lot to communicate. So I think yoga been disconnected from provenance.
You write that Indian and Chinese firms that face the provenance paradox currently can learn a lot from the Japanese firms of the 1950s and the Koreans of the 1980s. Could you discuss that in some detail?
The Korean studied what the Japanese did and what the Japanese did was at the low end. You enter at the low end and come up with a really really high quality product which doesn’t break down. You offer it really cheap and nobody wants the low end because they are all busy moving up into the high end. They have got legacy investments so they got to charge higher prices. So you get in. You keep improving your brand and you gradually keep moving up.  The Japanese moved up as high as the market would let them. So in the case of Toyota it was Lexus. In case Honda it was Acura and in case of Nissan it was Infiniti.
And the Koreans learnt from this?
The Korean car manufacturers watched that and they are now outsmarting the Japanese in many ways because they are coming in with the same low end strategy but they are moving up faster. And they are moving up faster, so far at least, keeping the same brand. So Hyundai has been very successful. Kia has been very successful. The other examples from Korea are Samsung and LG in electronics. What they did is they looked at what Sony did and what Matsushita and what Panasonic did and they are copying that strategy but going one step better. So the Japanese are in a little bit of disarray right now for a variety of reasons and Koreans are overtaking them. Samsung is now taking away significant market share away from Sony.
So how would it work in the context of let’s say an Indian IT company like TCS?
We have already seen the IT companies like Infosys, TCS and Wipro, doing a very good job at the low end, which is basically what they were doing with call centre kind of work and business process redesign work. But moving up the chain is proving to be difficult. So here you are not just moving up in price but you are moving up in the nature of the service being offered because now you are getting into strategic consulting work which is a sort of the domain of the IBM’s consulting services or Accenture’s consulting services. And that’s become an issue. Also what has happened is a lot of these competitors like IBM and Accenture have said you know what if it is a labour cost advantage, let’s invest in India and set up huge operations there.
Yes that is true
So IBM’s largest employment is in India now. Accenture has huge investments here. And then what makes it even more serious for companies like Infosys and TCS is that many of their key clients have said that we will set up our own IT operations in India. And they call them captive. And they are saying that we don’t have to worry about somebody else’s security systems or value systems for that matter. We will train them. They are our employees. Fidelity which is a very large financial services institution headquartered in Boston has significant investment in India and they are planning to increase their headcount here. And a lot of that work was being done by Infosys.
So basically Indian IT companies cannot move on the up end and are also being hit on the low end?
That’s right. That is the big picture. All these strategies work for a while but then somebody figures it out. It is so dynamic and that’s what makes it so exciting.
Can you tell us something about the course you are teaching in India? 
It is a course that was designed at the Harvard Business School to cover topics of ethics and corporate governance. These were topics that were not being covered in any significant way in our curriculum. And after some history of trying to cover them within mainstream subjects like marketing ethics for instance or financial ethics, we decided to come up with a full course.
It’s a compulsory course?
It’s required first year MBA course. It’s taught not as ethics but it’s taught as a leadership course. And so one of the frameworks that we use is what we call the three lenses of leadership. And the three lenses of leadership are financial lens, the obvious one, the legal lens and the ethical lens. And the notion is that in framing problems you want use all three lenses. Students like to come to a business school because they like to learn about the financial lens. They are really not thinking about the legal lens. And they don’t even know how to formulate questions around the ethical lens. And that’s what we talk about.
The article was originally published on www.firstpost.com with a different headline on November 26, 2012.
(Vivek Kaul is a writer. He can be reached at [email protected])